कटनी। भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार की ज़ीरो टॉलरेंस नीति के दावे ज़मीनी हकीकत में खोखले साबित होते दिख रहे हैं। RTO संतोष पाल और उनकी पत्नी रेखा पाल के खिलाफ ने 650 गुना अनुपातहीन संपत्ति का गंभीर मामला दर्ज किया, और अब ने करीब साढ़े तीन करोड़ रुपये की संपत्तियों को अस्थायी रूप से जब्त कर लिया है।
इसके बावजूद न तो सरकार की नींद टूटी, न ही प्रशासन हरकत में आया।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब ईओडब्ल्यू और ईडी—दोनों जांच एजेंसियों की तलवार इस दंपति पर लटक रही है, तब भी परिवहन मंत्री और कटनी जिले के प्रभारी मंत्री की रहस्यमयी मेहरबानी आखिर क्यों बरकरार है? उलटे, इस भ्रष्टाचार के आरोपी दंपति को मनचाही पोस्टिंग देकर पहले कटनी और फिर महानगर जबलपुर जैसे अहम जिले की कमान सौंप दी गई।
जबकि ईओडब्ल्यू इस काले साम्राज्य पर शिकंजा कस चुका था—तो क्या यह महज़ संयोग है, या सत्ता के भीतर बैठे किसी मजबूत संरक्षण का नतीजा?
मुख्यमंत्री की चुप्पी—सवालों के घेरे में सरकार
भ्रष्टाचार पर कड़े संदेश देने वाले की सरकार से अब पूरा प्रदेश तीखे सवाल पूछ रहा है—
- ईडी की कार्रवाई के बाद भी तत्काल निलंबन क्यों नहीं?
- संवेदनशील पद पर बने रहने की अनुमति आखिर किसके आदेश से?
- क्या जांच एजेंसियों की सख्ती सिर्फ कागज़ों और फाइलों तक सीमित है?
‘सुरक्षित पोस्टिंग’ की कहानी
सूत्रों की मानें तो जिस अधिकारी पर भारी अनुपातहीन संपत्ति और भ्रष्टाचार के पुख्ता आरोप हों, उसे सबसे सुरक्षित और प्रभावशाली कुर्सियों पर बैठाना सिस्टम की प्राथमिकताओं पर करारा तमाचा है। इससे साफ संदेश जाता है कि
ईमानदार अफसर हाशिये पर हैं और भ्रष्टाचार सत्ता की छाया में फल-फूल रहा है।
अंदरूनी पकड़ बेहद मजबूत
ईडी की जब्ती, ईओडब्ल्यू की एफआईआर और फिर भी कोई प्रशासनिक कार्रवाई नहीं—ये तमाम तथ्य मिलकर एक ही संकेत देते हैं:
संतोष पाल–रेखा पाल दंपति की सरकार के भीतर पकड़ बेहद मजबूत है।
वरना जांच की आग में घिरे अधिकारी को बार-बार पुरस्कृत पोस्टिंग कैसे मिलती?
प्रदेश की जनता अब जवाब चाहती है।
क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग सिर्फ भाषणों और पोस्टरों तक सीमित रहेगी,
या सत्ता सच में कठोर और निष्पक्ष कदम उठाएगी?
आज नहीं तो कब?

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