बुधवार, 31 दिसंबर 2025

RTO संतोष पाल सहित पत्नी परिवहन विभाग में ही लिपिकरेखा पाल की ‘काली कमाई’ पर ED का प्रचंड प्रहार, फिर भी कुर्सी सुरक्षित!

73 लाख की कुल आय और 4.80 करोड़ की संपत्ति—जबलपुर में 3.38 करोड़ अटैच, भ्रष्टाचार और राजनीतिक संरक्षण बेनकाब

जबलपुर/भोपाल। मध्यप्रदेश के परिवहन विभाग में लंबे समय से पनप रहे भ्रष्टाचार पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने करारा वार करते हुए जबलपुर RTO संतोष पाल और परिवहन विभाग की वरिष्ठ लिपिक रेखा पाल की 3.38 करोड़ रुपये की अवैध संपत्तियों को PMLA, 2002 के तहत अटैच कर दिया है। यह कार्रवाई सिर्फ एक अधिकारी तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे परिवहन सिस्टम की सड़ांध को उजागर करने वाला धमाका मानी जा रही है।

ED की जांच में सामने आया कि जिनकी कुल वैध आय महज 73.26 लाख रुपये थी, उन्होंने जांच अवधि में करीब 4.80 करोड़ रुपये की संपत्ति अर्जित और खर्च कर डाली। यानी 4.06 करोड़ रुपये की बेहिसाबी काली कमाई। सवाल सीधा है—
👉 इतनी दौलत आखिर आई कहां से और किसके संरक्षण में?


EMI से पहले नकद जमा—मनी लॉन्ड्रिंग का खुला फार्मूला

जांच के दौरान बैंक खातों में बार-बार भारी नकद जमा होने के ठोस सबूत मिले। हैरानी की बात यह रही कि यह नकदी अक्सर लोन की EMI चुकाने से ठीक पहले जमा की जाती थी। ED का साफ कहना है कि यह बैंकिंग सिस्टम के जरिए अवैध नकदी खपाने का सुनियोजित तरीका है, जिसे मनी लॉन्ड्रिंग का स्पष्ट modus operandi माना गया है।

यह मामला अब केवल रिश्वतखोरी का नहीं, बल्कि संगठित आर्थिक अपराध का रूप ले चुका है।


https://x.com/i/status/2005960058933567494

घर, फ्लैट, खेत और दुकानें सील

ED द्वारा ‘Proceeds of Crime’ मानते हुए जिन संपत्तियों को अटैच किया गया, उनमें—

  • आवासीय मकान
  • रेजिडेंशियल प्लॉट
  • कृषि भूमि
  • व्यावसायिक दुकानें

सभी संपत्तियां जबलपुर जिले में स्थित हैं। जांच एजेंसी का दावा है कि ये संपत्तियां अवैध आय से खरीदी गईं और इसलिए इन्हें अस्थायी रूप से कुर्क किया गया है।


EOW की FIR से खुला पूरा खेल

यह मामला पहले EOW भोपाल में दर्ज FIR से शुरू हुआ, जो भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत थी। प्रारंभिक जांच में आय से अधिक संपत्ति के गंभीर आरोप सामने आने के बाद केस PMLA के दायरे में पहुंचा और ED ने सीधे मोर्चा संभाल लिया।


सबसे बड़ा सवाल—ED की कार्रवाई के बाद भी RTO पद पर कैसे कायम?

सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि करोड़ों की संपत्ति अटैच होने और मनी लॉन्ड्रिंग जैसे गंभीर आरोपों के बावजूद, संबंधित RTO का परिवहन मंत्री के प्रभार वाले जिले में परिवहन अधिकारी के रूप में पदस्थ बने रहना। यह स्थिति साफ तौर पर मजबूत राजनीतिक पकड़ और सत्ता संरक्षण की ओर इशारा करती है।

सामान्य हालात में ऐसे मामलों में अधिकारी को तत्काल निलंबित या हटाया जाता है, लेकिन यहां प्रशासनिक चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है।
👉 क्या कानून सबके लिए बराबर है?
👉 या फिर राजनीतिक छत्रछाया में नियम-कानून बौने साबित हो रहे हैं?


आगे और बढ़ सकती है कार्रवाई

कानूनी जानकारों के अनुसार, यदि PMLA के तहत आरोप सिद्ध होते हैं तो यह संपत्तियां स्थायी रूप से जब्त हो सकती हैं और अभियोजन (Prosecution) की प्रक्रिया भी तेज होगी। ED की यह कार्रवाई परिवहन विभाग में भ्रष्टाचार और अवैध कमाई के पूरे नेटवर्क पर बड़ा सवालिया निशान है।


ED की यह कार्रवाई केवल एक RTO पर नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर करारा तमाचा है। अब सवाल यह नहीं कि भ्रष्टाचार हुआ या नहीं—
सवाल यह है कि ऐसे ‘कमाऊ अफसरों’ को आखिर किसका संरक्षण प्राप्त है?
और क्या अगला नंबर बाकी चेहरों का भी आएगा, या फिर यह मामला भी समय के साथ दबा दिया जाएगा?

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