कटनी: "मानवता का अंतिम अपमान" - ये महज कोई भावुक शब्द नहीं, बल्कि कटनी में सामने आई एक शर्मनाक सच्चाई है। एक लावारिस शव को नगर निगम की कचरा गाड़ी में घसीटते हुए अंतिम संस्कार के लिए ले जाया गया। यह घटना उस शहर की है, जहाँ हर दूसरा व्यक्ति स्वयं को 'समाजसेवी' होने का दावा करता है।
कहाँ गए 'समाजसेवी' और उनके शव वाहन?
कटनी की राजनीति पर नज़र डालें तो ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ हर गली-मोहल्ले में मानवता के पुजारी भरे पड़े हैं। महापौर से लेकर पार्षदों तक, हर किसी की अपनी संस्था है, जो "शव वाहन सेवा" प्रदान करने का दावा करती है। लेकिन यह घटना उन दावों की पोल खोल देती है। जब एक बेसहारा, लावारिस शव के लिए ये तथाकथित समाज सेवा नदारद हो जाए, तो क्या यह मात्र 'दिखावा' नहीं है?
इस हृदय विदारक घटना ने न केवल नगर निगम की लचर व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि उन नेताओं, सामाजिक संगठनों और तथाकथित एनजीओ की असलियत भी उजागर कर दी है, जो सेवा के नाम पर 'राजनीति' का धंधा चला रहे हैं।
समाज सेवा का पाखंड
लावारिस शव बोल नहीं सकता, वह कोई आवेदन नहीं दे सकता। शायद इसीलिए सिस्टम ने भी उसे इंसान नहीं समझा। महापौर की संस्था हो या पार्षद मौसुफ़ बिट्टू की संस्था, या फिर पूर्व पार्षद विनय दीक्षित और अन्य समाजसेवी संगठन—कोई भी मदद के लिए आगे नहीं आया। जिन लोगों ने ऐसे कामों से प्रसिद्धि हासिल की है, वे सभी उस वक्त गायब थे, जब एक लावारिस शव को ट्रैक्टर में घसीटते हुए रखने का अमानवीय दृश्य सामने आया। यह केवल एक शव का अपमान नहीं था, बल्कि यह इस पाखंडी समाज सेवा की असलियत भी थी।
क्या समाज सेवा केवल कैमरे की मोहताज?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है: क्या समाज सेवा सिर्फ कैमरों के सामने की जाने वाली रस्म अदायगी बनकर रह गई है?
हद है...शव के अपमान पर भी सीधी कारवाई से परहेज
अब शुरू हुआ नोटिस पर नोटिस का खेल, जिसे भी चंद दिनों में दफना दिया जाएगा, क्योंकि लाशें बोलती नहीं है मानवता मर चुकी है। इसका जीता जागता उदाहरण आज कटनी शहर में देखने को मिला।
प्रभारी स्वास्थ्य अधिकारी संजय सोनी और क्षेत्रीय स्वछता प्रभारी तेजभान सिंह को नोटिस जारी कर निगमायुक्त ने तीन दिवस के अंदर जवाबतलब किया है
और अंत में याद रखिए -
मौत सबसे बड़ा सच है, और ऊपर वाले के दरबार में न कोई नेता होता है, न कोई वीआईपी। वहाँ केवल इंसानियत देखी जाती है... जो यहाँ मर चुकी है।

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