स्टेट 24 न्यूज/कटनी-
"भैया… जेब में वजन हो तभी थाने की चौखट लांघना..."
कटनी जिले में यह जुमला अब कोई दबी जुबान में नहीं, बल्कि चौक-चौराहों पर सरेआम गूंज रहा है। कानून सबके लिए बराबर होता है, यह बात किताबों तक तो ठीक है, लेकिन कटनी पुलिस की मौजूदा कार्यप्रणाली को देखकर जनता पूछ रही है— क्या जिले में दो अलग-अलग संविधान चल रहे हैं?
कप्तान के बदलने के बाद से ही जिले के थानों का मिजाज बदला-बदला नजर आ रहा है। आरोप हैं कि अब न्याय की तराजू पर पीड़ित का दर्द नहीं, बल्कि उसकी 'पहुंच और पॉकेट' का वजन तौला जा रहा है। हालिया दो घटनाओं ने पुलिस महकमे के दोहरे मापदंड को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है।
मामला नंबर 1: बहोरीबंद में 'सिंघम' स्टाइल एक्शन, TI नपे!
कुछ दिनों पहले बहोरीबंद थाने के अंतर्गत एक आरक्षक पर भूसा गाड़ियों से 500-500 रुपये की अवैध वसूली का आरोप लगा। फिर क्या था? पुलिस महकमे ने किसी बॉलीवुड फिल्म की तरह स्क्रिप्ट तैयार की।
एक्शन: एसडीओपी स्तर की अधिकारी खुद कई किलोमीटर दूर 'रेड' मारने पहुंचीं।
दिखावा: आरक्षक को रंगे हाथों पकड़ा गया, बकायदा प्रेस विज्ञप्ति जारी हुई और 'जीरो टॉलरेंस' का ढिंढोरा पीटा गया।
नतीजा: 'कमांड एंड कंट्रोल' की थ्योरी के तहत थाना प्रभारी अखिलेश दहिया की जवाबदेही तय हुई और उन्हें तत्काल लाइन अटैच कर दिया गया।
जनता की सोच: वाह भाई वाह! लगा कि कानून का इकबाल बुलंद है। लेकिन यह उत्साह ज्यादा दिन नहीं टिका।
मामला नंबर 2: स्लीमनाबाद में 'हजारों की डिमांड', TI,SDOP पर मेहरबानी क्यों?
अब जरा दूसरी तस्वीर देखिए। ताजा मामला स्लीमनाबाद थाने का है। कार्यवाहक उपनिरीक्षक (SI) संतोष बड़गैया पर आरोप लगा कि उन्होंने एक पीड़ित से सिर्फ आवेदन की पावती (Receipt) देने के बदले हजारों रुपये की मोटी रकम मांग ली।
घबराए पीड़ित ने दोस्त जरिए सीधे पुलिस अधीक्षक अभिनय विश्वकर्मा तक बात पहुंचाई। मामला बढ़ा, तो रस्म अदायगी करते हुए SI को सस्पेंड कर लाइन हाजिर कर दिया गया।
लेकिन असली खेल यहीं से शुरू होता है...
जब थाने के भीतर यह सौदा हो रहा था, तब **थाना प्रभारी (TI) साहब वहीं मौजूद थे।
हद तो यह है कि जिस डिवीजन में यह थाना आता है, उसी डिवीजन की एसडीओपी का कार्यालय भी महज चंद कदमों की दूरी पर है।
जनता के तीखे सवाल: साहब, आपकी 'कानून की किताब' में दो नियम क्यों?
स्टेट 24 न्यूज के जरिए कटनी की जनता पुलिस प्रशासन से सीधे ये 3 सुलगते सवाल पूछ रही है:
1.भेदभाव क्यों?
जब 500 रुपये की आरक्षक की वसूली पर बहोरीबंद के थाना प्रभारी को लाइन अटैच किया जा सकता है, तो स्लीमनाबाद में TI और sdop कार्यालय की नाक के नीचे हजारों की डिमांड होने पर उन पर आंच क्यों नहीं आई?
2.चेहरा देखकर कार्रवाई?
क्या पुलिस महकमे में 'अपनों पर रहम और गैरों पर सितम' की नीति चल रही है? क्या कार्रवाई का पैमाना अपराध नहीं, बल्कि चेहरा देखकर तय होता है?
3.अफसरों को छूट क्यों?
स्लीमनाबाद मामले में संबंधित एसडीओपी की जिम्मेदारी क्यों तय नहीं की गई, जबकि उनका दफ्तर थाने के बिल्कुल करीब है?
🤫 'नो कमेंट्स' के पीछे छिपी चुप्पी!
भ्रष्टाचार के खिलाफ लगातार 'सख्त' संदेश देने का दावा करने वाले पुलिस अधीक्षक अभिनय विश्वकर्मा की साख भी अब इन विरोधाभासी कार्रवाइयों से कटघरे में है।
इस पूरे दोहरे रवैये पर जब 'स्टेट 24 न्यूज' ने पुलिस अधीक्षक अभिनय विश्वकर्मा का पक्ष जानने की कोशिश की, तो साहब ने इस विषय पर अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।
कप्तान साहब की यह चुप्पी अपने आप में कई अनकहे जवाब दे रही है। एक तरफ 'जीरो टॉलरेंस' का फिल्मी प्रचार और दूसरी तरफ अपनों को बचाने का ये कथित 'सिस्टम'... कटनी पुलिस की यह थ्योरी जनता के गले नहीं उतर रही है। अब देखना यह है कि पुलिस महकमा इन तीखे सवालों का जवाब किसी निष्पक्ष कार्रवाई से देता है, या फिर 'रसूखदारों' को बचाने का यह खेल यूं ही जारी रहेगा।

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