राज्य ब्यूरो | भोपाल/कटनी मध्य प्रदेश पुलिस अब अपराध और अपराधियों से निपटने के लिए पारंपरिक तरीकों से आगे बढ़कर हाईटेक रणनीति पर काम कर रही है। प्रदेश में पहली बार अपराधियों का ऐसा डिजिटल डेटाबेस तैयार किया गया है, जो न सिर्फ उनकी पहचान बल्कि उनकी गतिविधियों, चाल-ढाल और बायोमेट्रिक पैटर्न तक को रिकॉर्ड करेगा।
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के ‘मेजरमेंट कलेक्शन यूनिट’ (MCU) प्रोजेक्ट के तहत अब तक प्रदेश के करीब 7,500 शातिर अपराधियों की डिजिटल प्रोफाइलिंग की जा चुकी है।
पुलिस अधिकारियों का दावा है कि यह सिस्टम प्रदेश में अपराध नियंत्रण की दिशा में “गेम चेंजर” साबित होगा। इससे अंतरराज्यीय अपराधियों, संगठित गिरोहों और फरार बदमाशों तक पहुंच आसान होगी।
अब एक क्लिक में अपराधी की पूरी कुंडली
नई व्यवस्था के तहत अपराधियों का डेटा सीधे केंद्रीय एजेंसियों जैसे CBI, NIA, DRI और ATS से जोड़ा जा रहा है। इससे प्रदेश और देशभर की एजेंसियों के बीच सूचना का आदान-प्रदान रियल टाइम में संभव हो सकेगा।
कटनी पुलिस अधीक्षक अभिनय विश्वकर्मा के अनुसार, “डिजिटल सिस्टम के जरिए किसी भी संदिग्ध की पहचान अब कुछ ही सेकंड में की जा सकेगी। फेशियल रिकग्निशन तकनीक भी इसमें अहम भूमिका निभाएगी।”
अब नाम बदलने या हुलिया बदलने से नहीं बचेगा अपराधी
पुलिस केवल फोटो और फिंगरप्रिंट तक सीमित नहीं रही। नई डिजिटल प्रोफाइल में अपराधियों के कई स्तरों पर बायोमेट्रिक और व्यवहारिक डेटा जुटाया जा रहा है—
- डीएनए प्रोफाइलिंग
- फिंगरप्रिंट और पाम प्रिंट
- रेटिना स्कैन
- 12 अलग-अलग एंगल से फोटो
- चलने के तरीके (Gait Pattern) का वीडियो रिकॉर्ड
- डिजिटल हिस्ट्री और आपराधिक रिकॉर्ड
अधिकारियों का कहना है कि यदि कोई अपराधी चेहरा बदलने या पहचान छिपाने की कोशिश भी करे, तब भी उसकी चाल और बायोमेट्रिक पैटर्न उसे पकड़वा देंगे।
ड्रोन हमलों और साइबर चुनौतियों से निपटने की तैयारी
प्रदेश पुलिस केवल डेटा संग्रह तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य की चुनौतियों के लिए भी तैयारी कर रही है।
मध्य प्रदेश पुलिस ने नेशनल सिक्योरिटी गार्ड (NSG) के सहयोग से विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया है, जिसमें पुलिस जवानों को—
- ड्रोन हमलों से निपटना
- डिजिटल साक्ष्यों का विश्लेषण
- साइबर ट्रैकिंग
- हाईटेक निगरानी तकनीकों का उपयोग
जैसे विषयों पर प्रशिक्षित किया गया।
जेलों से लेकर थानों तक बनेगा डिजिटल नेटवर्क
इस परियोजना के तहत विचाराधीन और सजायाफ्ता कैदियों का भी डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जा रहा है। पुलिस मुख्यालय का लक्ष्य है कि प्रदेश के हर थाने को इस नेटवर्क से जोड़ा जाए, ताकि अपराधी कहीं भी छिपे हों, उनकी पहचान तुरंत हो सके।
सबसे बड़ी बात
इस हाईटेक सिस्टम के सॉफ्टवेयर और तकनीकी प्लेटफॉर्म का खर्च NCRB उठा रहा है, जबकि राज्य सरकार हार्डवेयर और बुनियादी ढांचे पर निवेश कर रही है।
पुलिस अधिकारियों का मानना है कि आने वाले समय में यह डिजिटल घेराबंदी प्रदेश में अपराधियों के लिए सबसे बड़ा खतरा साबित होगी।

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