कटनी में सिस्टम का क़त्ल—ज़िंदा किसान को सरकारी काग़ज़ों में मृत घोषित किया
कटनी। यह खबर नहीं, सरकारी सिस्टम पर करारा तमाचा है। यह कोई गलती नहीं, बल्कि लापरवाह अफसरशाही की ज़िंदा मिसाल है। जिले में एक किसान आज अपने अस्तित्व को साबित करने के लिए दफ्तरों की सीढ़ियां घिस रहा है, क्योंकि सरकारी रिकॉर्ड में उसे जिंदा नहीं, मृत घोषित कर दिया गया है।
रीठी तहसील के ग्राम गुरजीकला निवासी किसान रामभरण विश्वकर्मा ने समर्थन मूल्य पर 250 क्विंटल धान बेचने के लिए पंजीयन कराया था। लेकिन जैसे ही मोबाइल पर संदेश आया, किसान के पैरों तले ज़मीन खिसक गई—सिस्टम ने उसे कागजो पर “मृत” घोषित कर दिया। समग्र आईडी में भी वही दर्ज। नतीजा साफ—धान खरीदी रद्द, किसान की मेहनत, फसल और पेट पर सीधा प्रहार।
यह लापरवाही नहीं, किसान की हत्या है—काग़ज़ों में ही सही, लेकिन असर ज़मीनी है।
जिस अन्नदाता के दम पर सरकारें भाषण देती हैं, उसी अन्नदाता को सरकारी सिस्टम ने एक क्लिक में खत्म कर दिया।
किसान ने न्याय के लिए कई दफ्तरों में शिकायतें की, लेकिन वहां भी वही पुरानी कहानी—फाइलें चलीं, इंसाफ नहीं आया। खाद विभाग की इस शर्मनाक चूक ने किसान को मानसिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से तोड़ दिया। वह ज़िंदा है, लेकिन सरकारी दुनिया में उसकी कोई हैसियत नहीं।
दस दिनों तक अफसरों के चक्कर काटने के बाद जब कहीं सुनवाई नहीं हुई, तब मजबूर किसान कलेक्टर कार्यालय पहुंचा और फूट-फूटकर बोला—
“साहब, अगर मैं मर चुका हूं तो यहांआपके सामने कौन खड़ा है?”
किसान की पीड़ा सुनकर कलेक्टर आशीष तिवारी ने मामले की गंभीरता को देखते हुए एस डी एम को त्वरित जांच करवाने के निर्देश दिए हैं। लेकिन सवाल यह है—
क्या सिर्फ निर्देश काफी हैं?
क्या दोषी अफसरों पर कार्रवाई होगी या मामला भी फाइलों में दफन हो जाएगा?
आज सवाल सिर्फ रामभरण विश्वकर्मा का नहीं है।
अगर सिस्टम किसी जिंदा किसान को मृत घोषित कर सकता है, तो कल किसी और की बारी तय है।
यह घटना बताती है कि सरकारी तंत्र में किसान की कीमत एक डेटा एंट्री से भी कम हो चुकी है।
अब देखना होगा—
क्या सरकार काग़ज़ों में मारे गए इस किसान को इंसाफ देगी,
या फिर अन्नदाता यूं ही सिस्टम की कब्रगाह में दफन होता रहेगा?
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